पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब सामरिक गठजोड़ का भारत की सुरक्षा पर प्रभाव: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i9.137Keywords:
पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब समरिक गठजोड़, राष्ट्रीय सुरक्षा, पश्चिम-एशिया, दक्षिण-एशिया, सुरक्षा सहयोग, भू-राजनीति, शक्ति-संतुलनAbstract
संप्रति 7 अगस्त को पाकिस्तान- तुर्किये- सऊदी अरब के मध्य हुए रणनीतिक समझौते के परिपेक्ष्य में वर्तमान भू-राजनीति में शक्ति-संतुलन की प्रकृति में हो रहे परिवर्तन का अध्ययन इस शोध पत्र में शामिल है। वर्तमान वैश्विक व्यवस्था प्रमुख शक्तियों के प्रभाव तक सीमित न रहकर बहुध्रुवीयता, सामरिक साझेदारियों, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था की ओर बढ़ रही हैं, पश्चिम-एशिया, दक्षिण-एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने क्षेत्रीय शक्तियों को अपने पारंपरिक संबंधों से आगे बढ़कर रक्षा, सुरक्षा, कूटनीति एवं आर्थिक सहयोग के रूप में नए रणनीतिक सहयोग विकसित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब की विदेश नीति, क्षेत्रीय हित एवं सुरक्षा प्राथमिकताएं भिन्न-भिन्न होने के बावजूद रक्षा उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता, रणनीतिक संवाद, आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में इनके हितों का अभिसरण दिखाई देता है। पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और रणनीतिक स्थिति, तुर्किये की उभरती रक्षा-तकनीकी एवं सैन्य औद्योगिक क्षमता तथा सऊदी अरब की ऊर्जा, आर्थिक और क्षेत्रीय प्रभाव क्षमता इस सहयोग को एक महत्वपूर्ण सामरिक आधार प्रदान करती है। इस दृष्टि से यह संबंध केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित न रहकर व्यापक क्षेत्र शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
यह शोध पत्र पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब के रणनीतिक संबंधों की पृष्ठभूमि, तीनों देशों की विदेश नीतियों में आने वाले बदलाव और शक्ति संतुलन का गहन विश्लेषण करता है। साथ ही यह शोध पत्र इस नए गठजोड़ की तुलना नाटो जैसी संस्थाओं से करता है तथा अमेरिका,चीन,रूस जैसी महाशक्तियों की भूमिका को प्रदर्शित करता है एवं चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन करते हुए भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाली विभिन्न संभावित चुनौतियों का विश्लेषण कर उसका निदान प्रस्तुत करना होगा।


