प्रभा खेतान का रचना-संसार और स्त्री विमर्श की दार्शनिक सैद्धांतिकी

Authors

  • प्रो0 अनुपमा चतुर्वेदी प्रोफेसर (हिन्दी) विभागाध्यक्ष, नारायण महाविद्यालय, शिकोहाबाद (उ0प्र0) Author
  • प्रीति सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी), डी0ए0वी0, पी0जी0 काॅलेज, आजमगढ़ (उ0प्र0) Author

DOI:

https://doi.org/10.59828/ijhce.v1i4.22

Keywords:

प्रभा खेतान, रचना-संसार, स्त्री विमर्श, दार्शनिक सैद्धांतिकी, अस्तित्ववाद, आर्थिक स्वावलंबन, देह-विमर्श, छिन्नमस्ता, मारवाड़ी समाज, विश्व-भगिनीवाद

Abstract

प्रस्तुत शोध पत्र समकालीन हिंदी साहित्य की प्रखर लेखिका प्रभा खेतान के समग्र रचना-संसार में निहित नारीवादी वैचारिकी, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिरोध और स्त्री विमर्श की दार्शनिक सैद्धांतिकी का एक गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। प्रभा खेतान का वैचारिक मानस केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न होकर ज्यां-पाल सात्र्र के अस्तित्ववाद, सिमोन द बोउवार के स्त्रीवादी दर्शन और स्वयं के भोगे हुए कटु यथार्थ से निर्मित हुआ है। उन्होंने पारंपरिक ‘मौन के सौंदर्यशास्त्र‘ को पूरी तरह नकारते हुए स्त्री की वास्तविक मुक्ति के लिए आर्थिक स्वावलंबन और देह पर आत्मनिर्णय के अधिकार को दार्शनिक मूलाधार माना है।
इस अध्ययन के अंतर्गत लेखिका के प्रमुख उपन्यासों ‘पीली आँधी’, ‘छिन्नमस्ता’, ‘अपने-अपने चेहरे’ और ‘आओ पेपे घर चलें’ के साथ-साथ उनकी बहुचर्चित आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ के अंतःसंबंधों की पड़ताल की गई है। शोध पत्र यह रेखांकित करता है कि किस प्रकार खेतान ने कलकत्ता के मारवाड़ी व्यापारिक समाज की भौतिक व मानसिक घुटन, खोखले दोहरे मापदंडों, बाल विवाह, अनमेल विवाह तथा विवाह एवं दहेज जैसी संस्थाओं के भीतर निहित पितृसत्तात्मक और पूंजीवादी गठजोड़ का दार्शनिक विखंडन किया है। इसके अतिरिक्त, यह आलेख पारिवारिक संरचना के भीतर होने वाले बाल यौन शोषण, संबंधों के अलगाव-बोध तथा स्त्री की जैविक व मनोवैज्ञानिक आकांक्षाओं जैसे साहसिक विषयों पर प्रकाश डालता है। 

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Published

2025-12-30

How to Cite

प्रभा खेतान का रचना-संसार और स्त्री विमर्श की दार्शनिक सैद्धांतिकी. (2025). International Journal of Humanities, Commerce and Education, 1(4), 50-54. https://doi.org/10.59828/ijhce.v1i4.22
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