रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता में राष्ट्रीय अस्मिता
DOI:
https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i1.28Abstract
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आधुनिक हिंदी कविता के उन विशिष्ट कवियों में हैं जिनकी काव्य-चेतना राष्ट्रीय जीवन की धड़कनों से गहराई से जुड़ी हुई है। उनकी कविता भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, औपनिवेशिक दासता और सामाजिक-राजनीतिक अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध स्वर के रूप में उभरती है। दिनकर की रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना केवल भावनात्मक राष्ट्रप्रेम तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान से युक्त सक्रिय चेतना का रूप धारण करती है। उनकी कविता जनसाधारण को निष्क्रियता से बाहर निकालकर आत्मगौरव और प्रतिकार की भावना से भर देती है।
दिनकर के लिए राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं या राजनीतिक सत्ता का नाम नहीं है, बल्कि वह एक जीवंत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और नैतिक सत्ता है। उनकी कविता में भारतीय संस्कृति, पौराणिक प्रतीकों, ऐतिहासिक चरित्रों और लोक-परंपराओं के माध्यम से राष्ट्रीय अस्मिता का पुनर्निर्माण किया गया है। रश्मिरथी का कर्ण, कुरुक्षेत्र का युद्ध और हुंकार का विद्रोही स्वर—ये सभी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक बनकर उभरते हैं, जो अन्याय, विषमता और नैतिक पतन के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देते हैं। इस प्रकार दिनकर की कविता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सुदृढ़ आधारभूमि तैयार करती है।
प्रस्तुत शोध-पत्र में दिनकर की प्रमुख काव्य-कृतियों—रेणुका, हुंकार, रश्मिरथी और कुरुक्षेत्र—के आलोक में उनकी कविता में राष्ट्रीय अस्मिता के विविध आयामों का विश्लेषण किया गया है। इसमें वीर-रस, जनवादी चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक न्याय की अवधारणाओं को केंद्र में रखते हुए दिनकर की काव्य-दृष्टि की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है। यह अध्ययन प्रतिपादित करता है कि दिनकर की कविता न केवल अपने समय की आवाज़ है, बल्कि आज के सामाजिक और राष्ट्रीय संदर्भों में भी उतनी ही सार्थक और प्रेरणादायक बनी हुई है।
बीज शब्द : रामधारी सिंह दिनकर, राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय चेतना, हिंदी कविता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


