समकालीन वैश्विक संकटों के संदर्भ में बौद्ध दर्शन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

Authors

  • डॉ. सन्तराम पाल असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, आचार्य नरेन्द्र देव किसान पी.जी. कॉलेज, बभनान, गोंडा (उ.प्र.) Author

DOI:

https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i5.53

Keywords:

बौद्ध दर्शन, मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संकट, वैश्विक शांति, असमानता, पूंजीवाद

Abstract

समसामयिक मानव सभ्यता अभूतपूर्व बहुआयामी संकटों से जूझ रही है। जलवायु परिवर्तन, सामाजिक असमानता, मानसिक स्वास्थ्य महामारी और भू-राजनीतिक संघर्षों ने पारंपरिक समाजशास्त्रीय मॉडलों की सीमाओं को उजागर कर दिया है। यह शोधपत्र समकालीन वैश्विक संकटों के निदान और समाधान के रूप में बौद्ध दर्शन का एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। बौद्ध अवधारणाएँ जैसे 'प्रतीत्यसमुत्पाद', 'अनित्य', और 'करुणा' केवल व्यक्तिगत मुक्ति के मार्ग नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक संरचनाओं को समझने के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। यह शोधपत्र 'सक्रिय बौद्ध धर्म' के ढाँचे के भीतर यह जांच करता है कि कैसे तृष्णा उपभोक्तावादी पूंजीवाद को बढ़ावा देती है और कैसे 'अहं' सामाजिक ध्रुवीकरण को जन्म देता है? अध्ययन में द्वितीयक स्रोतों जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, आई.पी.सी.सी. रिपोर्ट और समकालीन सामाजिक आंदोलनों के संदर्भों का उपयोग किया गया है। गुणात्मक और विश्लेषणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए यह शोधपत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि बौद्ध समाजशास्त्र वैश्वीकरण के इस दौर में एक न्यायसंगत, टिकाऊ और शांतिपूर्ण वैश्विक समाज के निर्माण के लिए एक व्यावहारिक रूपरेखा प्रदान करता है।

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Published

2026-05-29

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Articles

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समकालीन वैश्विक संकटों के संदर्भ में बौद्ध दर्शन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण. (2026). International Journal of Humanities, Commerce and Education, 2(5), 20-23. https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i5.53
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