भारतीय इतिहास-लेखन पर औपनिवेशिक दृष्टिकोण का प्रभाव और आलोचनाएँ
Keywords:
औपनिवेशिक दृष्टिकोण, इतिहास-लेखन, स्रोत-चयन, अभिजात्यवादी प्रवृत्ति, क्षेत्रीय विविधता, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण, नव-औपनिवेशिक पुनर्निर्माण।Abstract
भारतीय इतिहास-लेखन पर औपनिवेशिक दृष्टिकोण का गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने इतिहास को पश्चिमी मानकों और राजनीतिक उद्देश्यों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया। यूरोपीय इतिहासकारों ने भारतीय समाज, संस्कृति और परंपराओं को द्वितीयक मानते हुए इतिहास की व्याख्या को अभिजात्यवादी और यूरो-केन्द्रित ढाँचे में सीमित कर दिया। परिणामस्वरूप, भारतीय इतिहास की विविधता, स्थानीय अनुभव, लोकजीवन, भाषा और सामाजिक संरचनाओं को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। औपनिवेशिक पद्धति ने स्रोत-चयन, कालक्रम और वैज्ञानिकता के नाम पर भारतीय परंपरागत इतिहास-दृष्टि की उपेक्षा की, जिससे इतिहास एकतरफा और राजनीतिक नैरेटिव में परिवर्तित हो गया। सामाजिक-आर्थिक बदलावों, वर्ग संबंधों और क्षेत्रीय विविधताओं की अनदेखी ने इतिहास को संकीर्ण रूप में प्रस्तुत किया। आधुनिक इतिहासकारों ने इन सीमाओं की आलोचना करते हुए स्थानीय और ग्रामीण स्रोतों, लोक कथाओं, परंपराओं और सामाजिक अनुभवों को इतिहास-लेखन का हिस्सा बनाया। इससे इतिहास अधिक बहुआयामी, समावेशी और सामाजिक यथार्थ को प्रतिबिंबित करने वाला बन रहा है। नव-औपनिवेशिक पुनर्निर्माण के माध्यम से भारतीय इतिहास को स्थानीय पहचान, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक जटिलताओं के साथ समझने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे राष्ट्रीय पहचान का अधिक प्रामाणिक स्वरूप विकसित होता है।


