सोशल मीडिया का साहित्य बनाम साहित्य का सोशल मीडिया

Authors

  • डॉ. कृष्ण कुमार पाल असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,का. सु. साकेत पी. जी. कॉलेज, अयोध्या, (उ. प्र.) Author

DOI:

https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i5.55

Abstract

डिजिटल क्रांति और इंटरनेट के सर्वव्यापी प्रसार ने आज साहित्य के सृजन, विसर्जन, प्रसार और आस्वादन की पूरी प्रक्रिया को आमूल-चूल परिवर्तित कर दिया है। वर्तमान साहित्यिक विमर्श में दो समानांतर किंतु भिन्न प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आई हैं प्रथम, 'सोशल मीडिया का साहित्य' और द्वितीय, 'साहित्य का सोशल मीडिया''सोशल मीडिया का साहित्य' उस नवीन साहित्यिक सृजन को रेखांकित करता है जो फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और व्यक्तिगत ब्लॉग्स जैसे डिजिटल मंचों पर सीधे जनमानस द्वारा लिखा जा रहा है, जिसमें तात्कालिकता, लघुता और अनौपचारिकता इसके मुख्य लक्षण हैं। इसके विपरीत, 'साहित्य का सोशल मीडिया' उस परिघटना को दर्शाता है जहाँ पारंपरिक और गंभीर साहित्य, स्थापित रचनाकार तथा प्रकाशन संस्थान अपने विपणन, पाठक-संवाद और प्रसार के लिए इन डिजिटल मंचों का उपयोग कर रहे हैं। प्रस्तुत शोधपत्र इन दोनों प्रवृत्तियों के मध्य के अंतर्संबंधों, उनके भाषाई एवं संरचनात्मक स्वरूप, साहित्यिक मूल्य, और लोकतांत्रिक चेतना का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है। यह शोध स्थापित करता है कि जहाँ सोशल मीडिया ने साहित्य का लोकतंत्रीकरण किया है, वहीं इसने साहित्यिक गुणवत्ता, संपादन-शून्यता और कॉपीराइट जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी पैदा किया है।

मुख्य शब्द: सोशल मीडिया, डिजिटल साहित्य, साहित्यिक विपणन, विमर्श, मुद्रण-संस्कृति, साइबर-संस्कृति।

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Published

2026-05-29

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Articles

How to Cite

सोशल मीडिया का साहित्य बनाम साहित्य का सोशल मीडिया. (2026). International Journal of Humanities, Commerce and Education, 2(5), 24-29. https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i5.55
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