भारतीय न्यायिक प्रणाली में सुधार हेतु प्रस्तावित कदमों का विश्लेषण: पारदर्शिता, दक्षता और जनसुलभता के दृष्टिकोण से एक अध्ययन

लेखक

  • Chhama Research Scholar, Department of Law, NIILM University, Haryana ##default.groups.name.author##
  • Dr. Vikas Deep Singh Kohli Professor, Department of Law, NIILM University, Haryana ##default.groups.name.author##

##semicolon##

https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i6.107

##semicolon##

न्यायिक सुधार, एसिड अटैक, पीड़ित न्याय, जनसुलभता, दोषसिद्धि दर

सार

भारतीय न्यायिक प्रणाली की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने सबसे असुरक्षित पक्षकार अपराध पीड़ित को कितनी पारदर्शिता, दक्षता और सुलभता से न्याय दे पाती है। प्रस्तुत अध्ययन एसिड हमला पीड़ितों के न्याय-अनुभव को प्रकरण-अध्ययन के रूप में लेकर न्यायिक सुधार हेतु प्रस्तावित कदमों 2013 के विधायी संशोधन, उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देश, मुआवज़ा-ढाँचा एवं बिक्री-विनियमन की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करता है, जिसमें अध्ययन क्षेत्र उत्तर प्रदेश रखा गया है। शोध प्रारूप वर्णनात्मक-विश्लेषणात्मक है, जो सिद्धांतशास्त्रीय विधि और द्वितीयक सांख्यिकीय आँकड़ों के संयोजन पर आधारित है। परिकल्पना परीक्षण हेतु काई-वर्ग सुसंगति परीक्षण प्रयुक्त हुआ। परिणाम दर्शाते हैं कि सुदृढ़ विधायी ढाँचे के बावजूद 2020–2022 के दौरान एसिड हमलों की घटनाओं में कोई सांख्यिकीय रूप से सार्थक गिरावट नहीं आई (p > 0.05), जबकि उत्तर प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध पंजीकृत अपराधों का अंश जनसंख्या-अनुपातिक अपेक्षा से सार्थक रूप से कम पाया गया (p < 0.001), जो पंजीकरण-बाधाओं का संकेतक है। निष्कर्षतः विधि-निर्माण की तुलना में क्रियान्वयन, अनुपालन-पारदर्शिता और पीड़ित-सुलभता सुधार-एजेंडे की सबसे दुर्बल कड़ियाँ हैं।

##submission.downloads##

प्रकाशित

2026-06-30

अंक

खंड

Articles
,