राजस्थान में किसान आंदोलन: एक ऐतिहासिक अध्ययन
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https://doi.org/10.59828/ijhce.v2i1.27सार
राजस्थान का सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य ऐतिहासिक रूप से किसान समुदाय की संघर्षशीलता से गहराई से जुड़ा हुआ है। मध्यकालीन और आधुनिक काल में राज्य की अधिकांश भूमि सामंती और जागीरदारी व्यवस्था के अधीन थी, जिसके कारण कृषकों को न केवल आर्थिक शोषण झेलना पड़ता था, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दबावों का भी सामना करना पड़ता था। उच्च वर्ग और ज़मींदारों के अत्याचार ने ग्रामीण जीवन को कठिन बना दिया था। ऐसी परिस्थितियों ने ग्रामीण जनता में असंतोष और विद्रोह की भावना पैदा की, जिससे किसान आंदोलनों की नींव पड़ी।
राजस्थान में किसान आंदोलन स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-उत्तर दोनों कालखंडों में महत्वपूर्ण रूप से उभरे। स्वतंत्रता-पूर्व काल में किसानों ने सामंती और जागीरदारी प्रथा के खिलाफ संगठित विरोध किया। करों की अधिकता, उत्पादन पर नियंत्रण और भूमि पर अधिकार की कमी ने किसानों को संगठित संघर्ष के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता-उत्तर काल में आंदोलन का स्वरूप बदल गया, जहाँ भूमि सुधार, न्यूनतम मजदूरी, सिंचाई और कर्ज मुक्ति जैसे आर्थिक एवं सामाजिक मुद्दे केंद्र में आए। इन आंदोलनों ने ग्रामीण चेतना को जाग्रत किया और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाई।
इन आंदोलनाओं का ऐतिहासिक महत्व केवल आर्थिक सुधार तक सीमित नहीं था। राजस्थान में किसान आंदोलनों ने सामाजिक न्याय, ग्रामीण सशक्तिकरण और राजनीतिक अधिकारों के उभार में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। आंदोलन किसानों को उनके अधिकारों के प्रति सजग करते हुए समाज में समानता और न्याय की भावना को बढ़ावा देते थे। इस प्रकार राजस्थान के किसान आंदोलन केवल आर्थिक संघर्ष नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक बने, जिन्होंने ग्रामीण जीवन और राज्य की ऐतिहासिक प्रक्रिया पर स्थायी प्रभाव डाला।
बीज शब्द: राजस्थान, किसान आंदोलन, जागीरदारी व्यवस्था, सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता-पूर्व और उत्तर


